Showing posts with label दोपहरी. Show all posts
Showing posts with label दोपहरी. Show all posts

Wednesday, May 22, 2019

ज़िन्दा होने का अहसास

जेठ की भरी दोपहरी में जब जिस्म
से टकराती हैं अंगारे उगलती हवायें
तो ज़िन्दा होने का अहसास होता है।
वैसे तो दुनिया के हर एक मोड़ पर
मिलने वाले लगते ढो रहे ज़िन्दगी
दिल खोखला रेशमी लिबास होता है।
यूं तो ओढ़े रहते कमोवेश हर लोग
अपने चेहरे पर दो इंच की मुस्कान
हक़ीक़त भांप लेता जो खास होता है।
कह भी तो न सकते सबसे हालेदिल
जाने क्या हो सामने वाले के मन में
ताड़ लेता है जो दिल के पास होता है।